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शहडोल में आस्था का अपमान या राजस्व का सम्मान?


शहडोल में आस्था का अपमान या राजस्व का सम्मान?

ठेकेदार मालामाल, संस्कार कंगाल: शहडोल की दर्दनाक तस्वीर

शहडोल : शहर इन दिनों एक अनोखे विकास मॉडल का साक्षी बन रहा है। यहां अब मंदिरों के आसपास शराब की दुकानें खुल रही हैं और शहर के बीचों-बीच मदिरालय सजाए जा रहे हैं। लगता है आबकारी विभाग और शराब ठेकेदारों ने मिलकर यह तय कर लिया है कि श्रद्धा और शराब का संगम ही आधुनिक शहरी विकास की नई परिभाषा है।
आखिर ठेकेदारों की भी अपनी मजबूरियां होंगी। यदि दुकान किसी सुनसान इलाके में खोल दी जाए तो ग्राहक तक पहुंचने में परेशानी होगी। इसलिए जनता की "सुविधा" को ध्यान में रखते हुए बाजार के बीच और मंदिर के बगल में दुकान खोल देना सबसे आसान उपाय समझा गया। अब भक्तों को दर्शन के साथ-साथ शराब की दुकान के दर्शन भी सहज उपलब्ध हैं।
आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली भी कम प्रशंसनीय नहीं है। कानून और नियमों की किताबें शायद अलमारी की शोभा बढ़ाने के लिए रखी गई हैं, क्योंकि जमीनी स्तर पर तो ऐसा प्रतीत होता है कि राजस्व के आगे सामाजिक और धार्मिक संवेदनाएं बहुत छोटी चीज हैं। विभाग शायद यह मान बैठा है कि जब तक सरकारी खजाना भर रहा है, तब तक मंदिर, स्कूल, मोहल्ले और आम नागरिकों की चिंता करना अनावश्यक है।
शराब ठेकेदारों की व्यावसायिक कुशलता भी देखने लायक है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि भीड़ कहां मिलेगी, लोगों की आवाजाही कहां अधिक है और बिक्री कैसे बढ़ाई जा सकती है। इसलिए शहर का प्रमुख बाजार और धार्मिक स्थल उनके लिए सबसे उपयुक्त स्थान बन जाते हैं। समाज पर पड़ने वाले प्रभाव से उनका कोई विशेष सरोकार नहीं होता, क्योंकि उनका लक्ष्य केवल बिक्री और मुनाफा होता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शहडोल केवल राजस्व कमाने का माध्यम बनकर रह गया है? क्या शहर की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और युवाओं का भविष्य अब आबकारी विभाग की फाइलों और ठेकेदारों के मुनाफे से कम महत्वपूर्ण हो गया है?
विडंबना देखिए, एक तरफ प्रशासन नशामुक्ति अभियान चलाता है, दूसरी तरफ शराब की दुकानों को ऐसे स्थानों पर स्थापित किया जाता है जहां हर वर्ग का व्यक्ति प्रतिदिन गुजरता है। मानो संदेश साफ हो—नशे से दूर रहिए, लेकिन दुकान आपके बिल्कुल पास ही रहेगी।
शहडोल के जागरूक नागरिकों को इस विषय पर आवाज उठानी चाहिए। क्योंकि जब निर्णय केवल राजस्व और मुनाफे के आधार पर लिए जाने लगें, तब समाज और संस्कृति की कीमत चुकानी पड़ती है।
प्रश्न केवल एक शराब दुकान का नहीं है, प्रश्न यह है कि क्या शहडोल की पहचान आस्था से बनेगी या आबकारी विभाग और ठेकेदारों की कमाई से?

 

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